प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ़ एक्सीलेंस चंद्रशेखर आजाद शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सीहोर में दिनांक 20 अगस्त 2026 को भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के अंतर्गत भारतीय अक्षय ऊर्जा दिवस मनाया गया। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ रोहिताश्व कुमार शर्मा ने इस अवसर पर बताया कि हम आधुनिक विकास के रास्ते पर जितना आगे बढ़ते गए और जितना हमने अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बिना विचारे दोहन किया उसके दुष्परिणाम आज ऊर्जा संकट के रूप में सामने आने लगे हैं। उन्होंने बताया की क्षरण प्रकृति का नियम है। हम कितनी भी भौतिक प्रगति कर लें अंत में जमीन पर आना ही पड़ता है, विकास के साइड इफैक्ट्स जरूर आते हैं। कितनी ही खोजें और आविष्कार कर लें यह संकट अवश्य आएंगे परंतु इस संकट की गति को कम अवश्य किया जा सकता है। जीने के लिए सही जमीन, सही हवा, सही पानी, सही ऊर्जा कैसे प्राप्त हो इसके लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम ऊर्जा के संसाधनों का आवश्यकता भर के लिए दोहन करें, उनका शोषण नहीं। ऊर्जा के कृत्रिम साधनों की तुलना में नैसर्गिक, जैविक प्राकृतिक साधनों का प्रयोग करने से जीवटता, रोग मुक्ति, प्रदूषण मुक्ति की ओर हमारी गति होगी। प्राचीन भारतीय पारंपरिक अक्षय ऊर्जा के संसाधनों का प्रयोग कर अपने जीने के ढंग से हम मानव जाति के लिए एक बेहतर पर्यावरण की सौगात दे सकते हैं।
विषय विशेषज्ञ डॉक्टर मौली थॉमस ने बताया कि अक्षय ऊर्जा दिवस हम सन 2004 से मना रहे हैं। भारतीय ऋषि मुनियों ने बताया कि हमारे प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे ऋग्वेद में सूर्य को ऊर्जा के एक अंतहीन स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है। सौर्यिक ऊर्जा पूर्ण है और पूर्ण में से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए तो अंत में पूर्ण ही शेष रहता है। अग्नि भौतिक और रासायनिक ऊर्जा का प्रतीक है, सूर्य चराचर जगत की आत्मा है जो सजीव और निर्जीव दोनों के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा और अक्षय स्रोत है। इसके अतिरिक्त अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोत पवन ऊर्जा, जल विद्युत ऊर्जा, जैविक ऊर्जा तथा भूतापीय ऊर्जा है। वैदिक साहित्य में सूर्य, अग्नि, और जल को जीवन व्यवस्था के मूल प्राकृतिक घटकों के रूप में महत्व दिया गया है। उन्होंने बताया कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी वर्षा मापन, जल प्रबंधन तथा प्राकृतिक चक्र प्रबंधन पर बल दिया गया है। यद्यपि अक्षय ऊर्जा के संसाधनों से भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है परंतु यह इतना कम होता है की प्रकृति स्वयं इसका उपचार कर लेती है। उन्होंने विस्तार से जानकारी दी कि भारत में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जल विद्युत ऊर्जा का सफलतापूर्वक उपयोग कहां-कहां हो रहा है। इन जगहों से प्रेरणा लेकर प्रत्येक क्षेत्र में इनका उपयोग प्रारंभ किया जा सकता है क्योंकि अक्षय ऊर्जा दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं है बल्कि यह हमें उस वादे की याद दिलाता है जो हमने सदियों पहले वेदों में प्रकृति से किया था। इस अवसर पर "भारतीय ज्ञान परंपरा और अक्षय ऊर्जा" विषय पर निबंध प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। कार्यक्रम के अंत में शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने ऊर्जा संरक्षण हेतु संकल्प लिया। कार्यक्रम का सफल संचालन तथा आभार प्रदर्शन भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ प्रभारी डॉ.तृप्ता झा ने किया।

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