कोलीपुरा श्री नृसिंह मंदिर में लगातार 12 दिनों तक चलेगा रामलीला का मंचन श्रीरामलीला हमारी सनातन संस्कृति, मर्यादा, धर्म और आदर्शों की जीवंत धरोहर-पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राकेश राय रामलीला में मनु-सतरूपा लीला का मंचन, तपस्या कर रहे मनु के पास पहुंचे, भगवान मांगा वरदान


सीहोर। श्रीरामलीला हमारी सनातन संस्कृति, मर्यादा, धर्म और आदर्शों की जीवंत धरोहर है। भगवान श्रीराम का जीवन हम सभी के लिए सत्य, सेवा, त्याग और कर्तव्य का प्रेरणास्रोत है। उक्त विचार शहर के कोलीपुरा चौराहे पर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर में आयोजित भव्य श्रीरामलीला के मंचन के दौरान मुख्य अतिथि पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राकेश राय ने कहे। उन्होंने सभी कलाकारों एवं आयोजन समिति को सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं भी दीं। प्रभु श्रीराम एवं भगवान श्री लक्ष्मी नृसिंह की कृपा से यह आयोजन सफल, भव्य एवं मंगलमय हो तथा समस्त क्षेत्र में सुख, शांति और समृद्धि का संचार हो।

इस मौके पर रामलीला मंचन का शुभारंभ मंदिर के संत माधव महाराज, महंत बृजेश शर्मा, सनातन सेना के प्रदेश सचिव पवन केवट, गणेश यादव, दिनेश राणा, अमन यादव आदि ने किया। कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष राकेश राय ने यहां पर मौजूद भजन गायकों और रामलीला के पात्र राम बने मनीष पांडे, दशरथ की भूमिका निभा रहे रितेश पांडे, वशिष्ठ संतोष चौबे, कौशल्या परवेश चौबे, सुरेन्द्र दुबे आदि का पुष्प माला पहनाकर स्वागत सम्मान किया।

लगातार 12 दिनों तक जारी रहेगी रामलीला

संस्कार मंच के प्रभारी मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि रामायण प्रचारक एवं रामलीला मंडल के तत्वाधान में शहर के कोलीपुरा स्थित प्राचीन श्रीनृसिंह लक्ष्मी मंदिर में प्रतिदिन रात्रि आठ बजे से 11 बजे तक जारी रहेगी। इसमें कलाकारों के द्वारा संगीतमय भगवान की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया जाएगा। महंत बृजेश शर्मा सहित अन्य ने श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों से रामलीला में शामिल होने की अपील की है।

रामलीला के पहले दिन मनु-शतरूपा की तपस्यासृष्टि के आरंभ

उन्होंने बताया कि पहले दिन रामलीला में भगवान श्रीराम के जन्म के अलावा मनु-शतरूपा की तपस्यासृष्टि के आरंभ में राजा स्वायंभुव मनु और रानी शतरूपा ने सांसारिक मोह-माया त्यागकर एकांत में वन की शरण ली। उन्होंने अपने मन को भगवान विष्णु के चरणों में समर्पित कर दिया और कठोर तपस्या की। आरंभ में वे केवल फल-फूल खाते थे, फिर केवल जल पीकर, और अंत में बिना कुछ खाए-पिए केवल श्वास के सहारे हजारों वर्षों तक जप करते रहे। भगवान विष्णु का वरदान उनकी इस अनन्य भक्ति और साधना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा। मनु और शतरूपा ने कहा कि वे अपने ही समान एक पुत्र को पाना चाहते हैं। तब नारायण ने मुस्कुराते हुए वरदान दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। प्रभु ने कहा कि अगले कल्प में जब आप अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या बनेंगे, तब मैं आपके घर राम के रूप में अवतार लूंगा।

दशरथ-कौशल्या के रूप में जन्म वरदान

 दशरथ-कौशल्या के रूप में जन्म वरदान के अनुसार, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि श्रृंगी और वशिष्ठ के मा र्गदर्शन में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न किया। यज्ञ की पूर्ण आहुति पर अग्निदेव प्रकट हुए और राजा दशरथ को दिव्य खीर से भरा पात्र दिया। राजा दशरथ ने यह खीर अपनी तीनों रानियों-कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा में वितरित की। प्रभु श्रीराम का अवतार खीर के प्रसाद को ग्रहण करने के दिव्य प्रभाव से माता कौशल्या की कोख से साक्षात् भगवान विष्णु श्रीराम के रूप में अवतरित हुए। 


Post a Comment

0 Comments