सीहोर। शहर के कोलीपुरा स्थित प्राचीन सिद्धपीठ श्री नृसिंह लक्ष्मी मंदिर में आस्था और उत्साह के साथ भगवान नृसिंह जयंती का आयोजन किया गया। इस मौके पर शाम को विशाल भंडारे का आयोजन किया था, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की। वहीं सुबह भगवान नृसिंह की पूजन, हवन और पूर्णाहुति के पश्चात दोपहर दो बजे महा आरती का आयोजन किया गया था। जिसमें श्री-श्री 1008 महामंडलेश्वर महंत रामभूषण दास महाराज के मार्गदर्शन में संत माधव दास महाराज, मुख्य यजमान श्रीमती नमिता अखिलेश राय, यज्ञाचार्य पंडित कुणाल व्यास सहित बड़ी संख्या में यजमानों ने वैदिक मंत्रों से आहुतियां दी।
लगातार पांच दिनों से नृसिंह मंदिर में भव्य पंच कुण्डात्मक श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा था, इसमें दो दर्जन से अधिक यजमानों ने नियमित रूप से सुबह आठ बजे से पूर्ण विधि-विधान से सेवा अर्चना की, नृसिंह महोत्सव के अंतर्गत पहले दिन महाकुंभ कलश यात्रा शाही सवारी सन्नी सरदार के मार्गदर्शन में ऐतिहासिक निकाली गई थी।
नृसिंह जयंती पर प्रवचन का आयोजन
कार्यक्रम प्रभारी पंडित मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि कोलीपुरा मंदिर क्षेत्र के हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है और यहां पर लंबे समय से नृसिंह जयंती मनाई जाती है। भगवान नृसिंह भक्तों की पुकार सुनकर आ जाते है। भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता माने जाते हैं, पौराणिक मान्यता एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इसी तिथि को भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए नृसिंह रूप में अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था। अत: इस कारणवश यह दिन भगवान नृसिंह की जयंती के रूप में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। ग्रंथों के अनुसार कश्यप नामक ऋषि के दो पुत्र थे। प्रथम पुत्र का नाम हरिण्याक्ष तथा दूसरे पुत्र का नाम हिरण्यकश्यप था। ऋषि की दोनों संतान असुर प्रवृति की थी। आसुरी प्रवृति होने के कारण भगवान विष्णु जी के वराह रूप ने पृथ्वी की रक्षा हेतु ऋषि कश्यप के पुत्र 'हरिण्याक्ष का वध कर दिया था। भाई की मृत्यु से दुखी तथा क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। उसने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा न पशु द्वारा, न दिन में मारा जा सकेगा न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से उसको प्राण का कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य छीन लिया और तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का उपासक था और यातना एवं प्रताड़ना के बावजूद वह विष्णु की पूजा करता रहा। हिरण्यकश्यप ने अनीति का सहारा लिया तथा अपने पुत्र की हत्या के लिए उसे पर्वत से धकेला गया, जिंदा जलाने का प्रयास किया। हर बार वह भगवान विष्णु की कृपा से बच जाता था। एक दिन गुस्से में उसने प्रह्लाद से बोला, कहां है तेरा भगवान। सामने बुला। प्रह्लाद ने कहा, प्रभु तो कण -कण में व्याप्त हैं। क्रोधित हिरण्यकश्यप ने कहा, अच्छा इस खम्बे में तेरा भगवान छिपा है? प्रह्लाद ने कहा, हां। यह सुन हिरण्यकश्यप ने खम्बे पर गदे से प्रहार किया। तभी खम्बे से भगवान नृसिंह प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को अपने जांघों पर रख उसकी छाती को नखों से फाड़कर उसका वध कर डाला।

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