सीहोर। मध्यप्रदेश का सीहोर जिला वर्तमान में अश्वगंधा आधारित औषधीय खेती के एक संगठित और उभरते हुए क्लस्टर के रूप में स्थापित हो रहा है। सीमित जल संसाधन, पारंपरिक फसलों में घटती लाभप्रदता तथा बढ़ती उत्पादन लागत की पृष्ठभूमि में किसानों ने एक व्यावहारिक और टिकाऊ विकल्प के रूप में अश्वगंधा की खेती को अपनाया है। इस परिवर्तन में आईटीसी चौपाल सागर का संरचित फील्ड सपोर्ट और तकनीकी मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। किसानों को उन्नत किस्मों वैज्ञानिक खेती पद्धतियों तथा बाजार उन्मुख उत्पादन प्रणाली से जोड़कर इस मॉडल को प्रभावी रूप से विकसित किया गया है।
इन किसानों ने शुरू की खेती
इछावर तहसील के ग्राम झालकी के किसान देवेंद्र पालीवाल ने आईटीसी चौपाल सागर के माध्यम से अश्वगंधा की खेती प्रारंभ की। प्रारंभ में इसे परीक्षण स्तर पर अपनाया गया, जिसके बाद बेहतर परिणामों के चलते इसे प्रमुख फसल के रूप में शामिल किया। किसान श्री पालीवाल ने बताया कि यह फसल कम जोखिम वाली है। जल उपयोग दक्षता अधिक है तथा बाजार में स्थिर मांग के कारण आय में निरंतरता बनी रहती है। श्यामपुर तहसील के ग्राम गुलखेड़ी के किसान महेश मालवीय ने भी आईटीसी चौपाल सागर के सहयोग और मार्गदर्शन में अश्वगंधा की खेती अपनाई। उन्नत बीजों एवं वैज्ञानिक पद्धतियों के प्रयोग से जड़ों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है तथा बेहतर विपणन के कारण उचित मूल्य प्राप्त हो रहा है। ग्राम शेखपुरा के किसान विनोद विश्वकर्मा ने भी दो साल पहले पांच एकड़ में अश्वगंधा की खेती प्रारंभ की थी। उनके अनुसार उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक पद्धतियों के कारण उत्पादन में स्थिरता आई है। यह फसल कम पानी में सफल होती है तथा कीटनाशक की आवश्यकता न होने से लागत में कमी आती है और लाभ बढ़ता है।
किसानों को दे रहे मार्गदर्शन
आईटीसी चौपाल सागर के माध्यम से समय-समय पर किसानों को नियमित फील्ड मार्गदर्शन और निगरानी के साथ पारदर्शी विपणन व्यवस्था एवं बाजार से जुड़ाव, उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक तकनीकों का प्रसार किया जा रहा है। साथ ही आईटीसी के वरिष्ट वैज्ञानिक डॉक्टर नागेंद्र मिश्रा भी किसानों को समय-समय पर तकनीकी प्रशिक्षण व फील्ड मार्गदर्शन भी दे रहे है। जिससे जिले के किसान अब अश्वगंधा की खेती में अपनी रुचि दिखा रहे है।

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