रामायण जी हमें संयुक्त परिवार का सूत्र बताती है भाईयों में प्रेम स्नेहा त्याग तपस्या का भाव जगाती है-पंडित राजेश शर्मा भगवान कारागार में जन्म लेकर भी भक्तों को बंधनों से मुक्त कर देते है नन्द घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की हाथी घोड़ा पालकी जय हो नन्द लाल की


सीहोर। रामायण जी हमें संयुक्त परिवार में जीना सिखाती है। भाईयों में प्रेम स्नेहा त्याग तपस्या का भाव जगाती है और भागवत गीता हमें भगवान की भक्ति के साथ मरना सिखती है। संयुक्त परिवार के लाभ अगर समझना है तो रामायाण महाग्रंथ को पढऩा चाहिए और सरलता से आत्मकल्याण के साथ मरना सीखना है तो भागवत गीता पढऩा चाहिए उक्त यद्गार सोमवार को मोर गार्डन में आयोजित कथा में सुनाते हुए पंडित राजेश शर्मा ने व्यक्त किए।


श्रद्धालुओं के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मउत्सव मनाया गया। यजमान अनिल सक्सेना और परिजनों ने गीताजी की आरती की और समस्त देवी देवताओं की विश्व कल्याण के लिए स्तुति की। पंडित राजेश शर्मा ने रामचरित्रमानस सुनाते हुए कहा कि राम जी के बाद कैकेयी के पुत्र भरत तथा सुमित्रा के दो पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। यद्यपि जन्म का दृश्य नारायण की लीला था लेकिन उनका शरीर माया से नहीं बल्कि दिव्य गुणों से युक्त था जिसे साक्षात् विष्णु का अवतार माना जाता है। लेकिन भागवत ने भी उनको दिव्य और आदर्श स्वरूप को धर्म का रक्षक बताया गया है। उन्होने कहा कि भगवान कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मथुरा के कारागार में माता देवकी और वासुदेव के यहाँ हुआ था। अत्याचारी राजा कंस की बहन का विवाह वासुदेव के साथ सम्पन्न हुआ था। और विवाह के पश्चात् आकाशवाणी हुई कि राजा कंस अपनी बहन देवकी की आठवीं संतान द्वारा मारा जाएगा। राजा कंस ने देवकी-वासुदेव को कारागार में डाल दिया था भगवान ने कारागार में जन्म लेने के बाद भी वासूदेव और भक्तों को बंधनों से मुक्त किया। देवकी ने अपनी आठवीं संतान को कृष्ण के रूप में जन्म दिया और कृष्ण के जन्म के समय सभी प्रहरी निश्चेतना अवस्था में हो गए और देवकी वासुदेव की हाथ की हथकड़ी पैर की बेडिय़ाँ खुल गई। वासुदेव को कृष्ण को टोकरी में रखकर रातों रात ही यमुना पार कर गोकुल में नन्द बाबा और यशोदा माता के घर छोड़ दिया। कंस ने पूतना को मायावी रूप धर कर गोकुल जाने को कहा और नन्द बाबा के यहाँ जन्मे शिशु को दुग्धपान कराने को कहा। पूतना जैसे ही नन्द महल पहुँची, श्री कृष्ण झूले में झूलते ही पूतना ने कृष्ण को दुग्धपान कराया।

इसी तरह कृष्ण का जन्म हुआ और कंस को अपने अत्याचारों से अवगत कराया और इस प्रकार धूमधाम से सभी श्रोतागण नाचते गाते धूमधाम मचाते नन्द घर आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की हाथी घोड़ा पालकी जय हो नन्द लाल की के थिरकते नजर आए। 


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