दस लक्षण धर्म के छठे अथ्याय उत्तम संयम धर्म विधान की पूजन अर्चना कर पुण्य लाभ अर्जित किया! इस संसार मे संयम धर्म दुर्लभ है जो प्राप्त कर उसे छोड देता है ---- पंडित राजकुमार

सीहोर।    दिगंबर जैन धर्म अनुसार दस लक्षण धर्म  पयूर्सण पर्व महाधीराज के छठवे थर्म  उत्तम संयम धर्म विधान मंडल  अर्चना  विद्वान  पंडित राजकुमार जेन के मार्ग दर्शन एवंम लोकप्रिय गीत संगीत आशीष जैन के दु संगीत का साथ श्रावक श्राविकाओ ने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किया!!

पंडित राजकुमार जैन ने शास्त्र वाचन के दौरान श्रावक श्राविकाओ को संबोधित करते हुए विस्तार से बताया कि
इस संसार में संयम धर्म दुर्लभ है, जो प्राप्त कर उसे छोड़ देता है वह मूढ़मति है, वह जरा और मरण के समूह से व्याप्त इस संसाररूपी वन में परिभ्रमण करता रहता है, पुन: वह सुगति को कैसे प्राप्त कर सकता है? पाँचों इन्द्रियों के दमन करने से संयम होता है, कषायों का निग्रह करने से संयम होता है, दुर्धर तप के धारण करने से संयम होता है और रस परित्याग के विचा लक्षण र भावों से संयम होता है। उपवासों के बढ़ाने से संयम होता है, मन के प्रसार को रोकने से संयम होता है, बहुत प्रकार के कायक्लेश तप से संयम होता है और परिग्रहरूपी पिशाच के छोड़ने से संयम होता है।
प्राणी-रक्षण और इन्द्रिय दमन करना संयम है।
स्पर्शन, रसना, घ्राण, नेत्र, कर्ण और मन पर नियंत्रण (दमन, कन्ट्रोल) करना इन्द्रिय-संयम है। पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है इन दोनों संयमों में इन्द्रिय संयम मुख्य है क्योंकि इन्द्रिय संयम प्राणी संयम का कारण है, इन्द्रिय संयम होने पर भी प्राणी संयम होता हैं, बिना इन्द्रिय संयम के प्राणी संयम नहीं हो सकता।
इन्द्रियाँ बाह्म पदार्थों का ज्ञान कराने में कारण है, इस कारण तो वे आत्मा के लिये लाभदायक हैं क्योंकि संसारी आत्मा इन्द्रियों के बिना पदार्थों को जान नहीं सकता। पँचेन्द्रिय जीव की यदि नेत्र-इन्द्रिय बिगड़ जावे तो देखने की शक्ति रखने वाला भी आत्मा किसी वस्तु को देख नहीं सकता।
परंतु इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आत्मा तो आकृष्ट (खींच) करके पथभ्रष्ट कर देती हैं, आत्मविमुख करके आत्मा को अन्य सांसारिक भोगों में तन्मय कर देती हैं, मोहित करके विवेक शून्य कर डालती हैं, जिससे कि साँसारिक आत्मा बाह्म-दृष्टि बन कर अपने फँसने के लिये स्वयं कर्मजाल बनाया करता है। इन्द्रियों का यह कार्य आत्मा के लिये दुख दायक
  संसार में संयम धर्म दुसंसारर्लभ है, जो प्राप्त कर उसे छोड़ देता है वह मूढ़मति है, वह जरा और मरण के समूह से व्याप्त इस संसाररूपी वन में परिभ्रमण करता रहता है, पुन: वह सुगति को कैसे प्राप्त कर सकता है? पाँचों इन्द्रियों के दमन करने से संयम होता है, कषायों का निग्रह करने से संयम होता है, दुर्धर तप के धारण करने  से संयम होता है और रस परित्याग के विचार भावों से संयम होता है। उपवासों के बढ़ाने से संयम होता है, मन के प्रसार को रोकने से संयम होता है, बहुत प्रकार के कायक्लेश तप से संयम होता है और परिग्रहरूपी पिशाच के छोड़ने से संयम होता है।
प्राणी-रक्षण और इन्द्रिय दमन करना संयम है।
स्पर्शन, रसना, घ्राण, नेत्र, कर्ण और मन पर नियंत्रण (दमन, कन्ट्रोल) करना इन्द्रिय-संयम है। पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है इन दोनों संयमों में इन्द्रिय संयम मुख्य है क्योंकि इन्द्रिय संयम प्राणी संयम का कारण है, इन्द्रिय संयम होने पर भी प्राणी संयम होता हैं, बिना इन्द्रिय संयम के प्राणी संयम नहीं हो सकता।

इन्द्रियाँ बाह्म पदार्थों का ज्ञान कराने में कारण है, इस कारण तो वे आत्मा के लिये लाभदायक हैं क्योंकि संसारी आत्मा इन्द्रियों के बिना पदार्थों को जान नहीं सकता। पँचेन्द्रिय जीव की यदि नेत्र-इन्द्रिय बिगड़ जावे तो देखने की शक्ति रखने वाला भी आत्मा किसी वस्तु को देख नहीं सकता।
परंतु इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर आत्मा तो आकृष्ट (खींच) करके पथभ्रष्ट कर देती हैं, आत्मविमुख करके आत्मा को अन्य सांसारिक भोगों में तन्मय कर देती हैं, मोहित करके विवेक शून्य कर डालती हैं, जिससे कि साँसारिक आत्मा बाह्म-दृष्टि बन कर अपने फँसने के लिये स्वयं कर्मजाल बनाया करता है। इन्द्रियों का यह कार्य आत्मा के लिये दुख दायक है

दस लक्षण पर्व   इसी श्रंखला में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर छावनी सिहोर में पिड़ावा से पधारे अतिथि विद्वान श्री राजकुमार जी शास्त्री के मार्ग दर्शन में गीत संगीत के साथ अभिषेक शांति धारा पूजन विधान आदि अनुष्ठान चल रहे है
आज के मुख्य दानदाता पुण्यार्जक परिवार
 प्रथम महावीर भगवान की शांति धारा कर्ताश्री निर्मल कुमार श्रीमती रेखा ,अभिषेक, निश्चिंत ,पारुल,सिंग परिवार मंडी
 दितीय शांति धारा कर्ता  श्री पार्श्वनाथ भगवान की शांति धारा श्री विमल कुमार श्रीमती कृष्णा देवी,सुनील श्रीमती प्रीति,विशाल श्रीमती नेहा,टोनी श्रीमती शिल्पी, शिवांग, अरनव, विवान शिव्वी,मुविता लिलहरिया परिवार परिवार
तृतीय चंद्र प्रभु भगवान की शांति धारा=श्रीमती गुलाब बाई,श्रीपाल श्रीमती अनिता,किशोर,प्रियंका,खुशबू,शीतल कुमार,राजी खुशी शास्वत , रॉय सरदार परिवार
चतुर्थ शीतल नाथ भगवान की शांति धारा श्री अशोक कुमार,अनिमेष श्रीमती शिखा,ईशान,आयुष,गुलशन ,भोलू लिलहरिया परिवार
पंचम  महावीर भगवान की शांति धारा एवम विधान कर्ता श्री महेंद्र कुमार प्रकाश कुमार,विजय कुमार ,संजय जैन धवल धुरंधर परिवार दिवड़िया वाले
.सोधर्म इंद्र स्वर्ण कलशाभिषेक कर्ता श्री निर्मल कुमार अभिषेक मंडी कमेटी वाले  परिवार
ईशान इंद्र स्वर्ण कलशाभिषेक कर्ता=श्री प्रदीप कुमार दीपक कुमार लिलहरिया  परिवार
प्रथम चार कलशा अभिषेक श्री अंबर  दर्श श्री स संस्कार   वीरेंद्र  
पारस आदित्य  जैन लिलेहेरिया परिवार !




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