डॉ. राघवेंद्र खेड़ले बोले- पराली और गन्ने के छिलके से बनेगा रोजगार, किसानों को MSME, बायो-सीएनजी और सरकारी योजनाओं की दी जानकारी


सीहोर/इछावर। अभ्युदय रिसर्च एंड सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन के तत्वावधान में तथा मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (एमपीसीएसटी), विज्ञान भवन, भोपाल के प्रायोजन से ग्राम पंचायत लाऊखेड़ी में आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला "पराली से समृद्धि : स्वच्छ पर्यावरण और खुशहाल जीवन" के दूसरे दिन किसानों, युवाओं और महिला स्व-सहायता समूहों को कृषि अवशेष आधारित उद्यम, एमएसएमई, सरकारी योजनाओं और आधुनिक तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई।


कार्यशाला में सचिव एवं विषय विशेषज्ञ डॉ. राघवेंद्र खेड़ले ने कहा कि पराली और गन्ने के छिलके जैसे कृषि अवशेष केवल कचरा नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले मूल्यवान संसाधन हैं। इनसे बायो-सीएनजी, जैविक खाद, कम्पोस्ट, गौकाष्ठ, ब्रिकेट्स तथा अन्य पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार कर किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। उन्होंने बताया कि यदि गांव स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित हों तो स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर विकसित होंगे।


अभ्युदय रिसर्च एंड सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन ने ग्रामीण क्षेत्रों में डॉ. राजकुमार मालवीय द्वारा किए जा रहे जनहित एवं विकासोन्मुखी प्रयासों की सराहना की। फाउंडेशन के सचिव डॉ. राघवेंद्र खेड़ले ने कहा कि डॉ. मालवीय सदैव सुदूर ग्रामीण अंचलों में पहुंचकर हमें प्रेरित करते हैं कि गांवों के विकास और किसानों के हित में निरंतर कार्य किया जाए। उनके मार्गदर्शन और सहयोग से ही इस प्रकार के जनजागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक आयोजित हो पा रहे हैं।


विषय विशेषज्ञ भागीरथ सिंगरौली ने किसानों को केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं, एमएसएमई पंजीयन, सब्सिडी, कौशल विकास कार्यक्रमों तथा उद्यम स्थापना की प्रक्रिया की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं का सही लाभ लेकर किसान और युवा कम लागत में अपना उद्योग शुरू कर सकते हैं। इसके लिए प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और विपणन की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।


विशेषज्ञों ने बताया कि पराली और गन्ने के छिलके से तैयार कम्पोस्ट एवं जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है। वहीं गौकाष्ठ और ब्रिकेट्स पारंपरिक ईंधन का पर्यावरण अनुकूल विकल्प बन रहे हैं, जिनकी बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है।


कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को विभिन्न उत्पादों के निर्माण की प्रक्रिया, आवश्यक मशीनों, लागत, विपणन और व्यवसाय प्रबंधन की जानकारी भी दी गई। विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की कि वे पराली जलाने के बजाय उसका वैज्ञानिक उपयोग कर अतिरिक्त आय का स्रोत बनाएं।


इस अवसर पर सरपंच धर्मेंद्र पचलासिया, पंचायत सचिव एवं रोजगार सहायक राजेंद्र सिंह ठाकुर, समाजसेवी शिवनारायण तोमर, पूर्व जनपद सदस्य सोभाल सिंह, सहायक राकेश राठौर तथा सतीश मालवीय की गरिमामयी उपस्थिति रही।


कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसान, महिला स्व-सहायता समूहों की सदस्याएं एवं ग्रामीण युवा शामिल हुए। प्रतिभागियों ने कृषि अवशेष आधारित उद्यमों को ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताते हुए ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उपयोगी और रोजगारपरक बताया।


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