सीहोर। भक्त को चित्र नहीं चरित्र देखकर किसी को मित्र बनाना चाहिए। सदमार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने वाला मित्र जीवन के संकटो को दूर कर देता है और कुमार्गी मित्र लोक परलोक दोनों को नष्ट भ्रष्ट कर देता है। मित्रता राम सुग्रीव और सुदामा कृष्ण की भांति होना चाहिए उक्त बात बुधवार को हनुमान फाटक मंदिर कस्बा परिसर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में सुदामा श्रीकृष्ण मिलन प्रसंग सुनाते हुए भागवत भूषण पंडित रविशंकर तिवारी ने कहीं। कलाकारों के द्वारा पंडाल में श्रीकृष्ण सुदामा के प्रसंग को जीवंत किया गया। भक्त और भगवान की भक्ति ने श्रद्धालुओं को प्रभावित किया। श्रीमद भागवत कथा श्रवण करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु शहर सहित ग्रामीण अंचलों से भी हनुमान फाटक मंदिर कस्बा परिसर पहुंचे। अनेक विशिष्टजनों ने भागवत भूषण पंडित रविशंकर तिवारी का व्यास गादी पर शॉल श्रीफल फूलमालाऐं पहनाकर सम्मान किया। यजमानों के द्वारा गीताजी की विधिवत पूजा अर्चना की गई।
भागवत भूषण पंडित रविशंकर तिवारी ने कहा कि भक्त की जैसी भावना होती भगवान वैसे ही दर्शन देते है। प्रभु तो त्रिकालदर्शी है अपने भक्त की सुरक्षा के लिए सुदर्शन चक्र भी चला देते है। प्रभु को उस पकवान शुद्ध सामग्री का भोग लगाना चाहिए जिस को हम पसंद करते है। भगवान को प्रेम से भोग लगाते ही वह प्रसाद बन जाता है। सूर्य अस्त के बाद ब्राहम्काल के पहले नदी में असुरी शक्तियों का वास होता है इस लिए सूर्यअस्त के बाद नहीं ब्राहम्काल में तीर्थ नदी में स्नान करना चाहिए कथा आती है कि यमुना दी में नदंबाबा सूर्य अस्त के बाद स्नान करने चले गए थे तब वरूण ने उन्हें बंदी बना लिया था भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर वरूणदेव ने नंदबाबा को छोड़ा था।
भगवान नारायण ने अमरिश ऋषि की रक्षा के लिए सुदर्शन चक्र छोड़ दिया था सुदर्शन चक्र दुर्वासा ऋषि के पीछे लग गया था तब दुर्वासा ऋाषि ब्राहम्मा जी के पास पहुंच उन्होने सहायता से मना कर दिया तब सुर्वासा शिवजी के पास पहुंचे उन्होने बताया की सुदर्शन चक्र हमारा नहीं अस्त्र नहीं है आप को नारायण के पास ही जाना होगा वहीं आपकी रक्षा कर सकते है तब नारायण भगवान ने कहा कि अमरिश ऋाषि भक्त है उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है भक्त के लिए भगवान स्वयं चले आते है प्रभु अपने सुदर्शन चक्र से भी दुष्टों से भक्त की रक्षा करते है। इस लिए एकादशी का व्रत सबको करना चाहिए एकादशी का व्रत करने से अमरीश ऋषि के मान को भगवान ने बढ़ाया था। पंडित रविशंकर तिवारी ने कहा कि शरीर साथ दे जब तक व्रत करना चाहिए लेकिन जब शरीर साथ देता है तब तो हम मद मस्त होकर घुमाते है। जब शरीर साथ नहीं देता तो भगवान की चौखट को पकड़ लेते है। शरीर साथ दे तबतक भजन पूजन इत्यादि सब करना चाहिए।
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