पितृपक्ष में पूर्वजों को दी जाती है हदृय से सच्ची श्रद्धांजली पूर्वजों के प्रति ही है श्रादपक्ष इस बार होंगे 15 दिन के पितृपक्ष- पंडित शर्मा

सीहोर। इस बार पितृपक्ष भाद्रपद मास शुक्लपक्ष पूर्णिमा सात सिंतबर रविवार से प्रारंभ होगा एवं अश्विन मास कृष्णपक्ष 21 सितंबर रविवार को पितृमोक्ष अमावस्या पर समापन होगा। इस बार दो तिथियों के एक ही दिन में सम्मिलित होने के कारण इस वार पितृपक्ष 15 दिनों के होंगे। मनुष्य अपने जीवनकाल में पूजा पाठ दान पुण्य कर अपने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करता है पितरों के प्रति श्रद्धा रखना ही पितृपक्ष है।



पंडित सुनील शर्मा के अनुसार सनातन धर्म में पितरों का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है चौरासी लाख योनियों में विचरण करते हुए अनेक जन्म मृत्यु से होकर जीव को मनुष्य जीवन मिलता है। प्रत्येक मनुष्य पर तीन प्रकार का ऋण होता है। जिस को देव ऋषि पितृ ऋण माना गया है। इस बार पितृपक्ष पूर्णिमा को भारत वर्ष में चंद्रग्रहण रहेगा व भारत वर्ष में दिखाई देने के कारण चंद्र ग्रहण का सूतक मान्य होगा। शास्त्रनुसार प्रात:काल में देवताओंं की पूजा होती है तथा मध्यान्ह काल पितृ पूजा केे लिए नियत होता है। इस लिए मनुष्य को मध्यान्हकाल में पिण्डदान तर्पण व्यवस्थानुसार करना चाहिए।


राहु और केतू बनाते है पितृदोष


ज्योतिषानुसार जब सभी ग्रह जन्मकुंडली में राहु व केतू के मध्य आ जाते है तो पितृदोष बनता है और मनुष्य को पितृदोष के कारण अपने जीवनकाल में कई उतार चड़ाव व परेशानियों का सामना करना पड़ता है इस स्थिति में मनुष्य को ब्राहम्णों की उपास्थिति में पितृ शांति करवाना चाहिए। कई बार हमारे पितरों की असमय मृत्यु हो जाती है और उन्हे अल्पायु प्राप्त होती है। तब मोक्ष प्राप्ति के लिए पितृशांति अवश्य कराना चाहिए । पंडित शर्मा ने बताया कि जिस मनुष्य पर पितृ प्रशन्न होते है उस मनुष्य पर देवताओं और नवग्रहों की कृपा सदेव बनी रहती है। पित्शांति के लिए पितृपक्ष सबसे उत्तम समय माना गया है।


दक्षिण दिशा में होती है पितरों की दिशा


हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पूर्वजों की तिथिनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध,तर्पण,ब्राहम्ण भोजन कराना चाहिए तथा जिन पितरों की तिथि मालूम नहीं हो उनका तर्पण पितृमोक्ष अमावस्या को करना चाहिए। पितृपक्ष में मनुष्य को अपने पितरों के निमित गीता पाठ, श्रीमद भागवत कथा, गरूण पूराण पितृसूक्त पौधारोपण आदि करना चाहिए, मनुष्य द्वारा काले तिल, जल, जो, फूल आदि पूजा सामग्री के माध्यम से पितृ तर्पण करना चाहिए,पीपल की पूजा व दीपक लगाना चाहिए पूर्व दिशा में देवताओंं, उत्तर दिशा में ऋषियों व दक्षिण दिशा में पितरों की दिशा मानी गई है इसी क्रमानुसार तर्पण किया जाना चाहिए। 


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