सीहोर। हर साल की तरह शहर के प्राचीन कोलीपुरा स्थित प्राचीन सिद्धपीठ श्री नृसिंह मंदिर में आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। इस मौके पर संत-महंत, साधुओं के साथ भगवान विष्णु और भगवान शिव का विशेष अभिषेक किया। वहीं श्रद्धालुओं ने भजन-कीर्तन का आयोजन किया।
दिव्य अनुष्ठान के पहले शहर के बढ़ियाखेड़ी स्थित बड़े मंदिर के महंत हरिहर दास दास, राधेश्याम मंदिर के अधिकारी बिन्दुदास महाराज का सम्मान नृसिंह मंदिर के संत माधवदास महाराज, संस्कार मंच के प्रभारी मनोज दीक्षित मामा, सतुआ बाबा, सनातन सेना के प्रदेश सचिव पवन केवट, आयुष गुप्ता सहित अन्य ने किया। इस मौके पर महंत ने बताया कि देवशयनी एकादशी है और इस दिन से ही भगवान विष्णु चार महीने की योग निद्रा में क्षीर सागर में विश्राम के लिए चले जाते हैं। देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाता है। चातुर्मास के शुरू होने के साथ ही सभी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं। चातुर्मास के शुरू होने के साथ ही कई तरह के नियमों का पालन करना होता है।
चार महीने तक शुभ और मांगलिक कार्य के लिए मुहूर्त नहीं
उन्होंने बताया कि देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास शुरू होता है और सभी तरह के शुभ कार्य चार महीनों के लिए थम जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन और अन्य मांगलिक संस्कारों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं माने जाते। मान्यता है कि भगवान विष्णु की कृपा और साक्षी के बिना संपन्न किए गए शुभ कार्य पूर्ण फल नहीं दे पाते, इसलिए चातुर्मास के दौरान ऐसे आयोजनों से परहेज किया जाता है। जहां शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं तो वहीं चातुर्मास को साधना, भक्ति और आत्मिक उन्नति का श्रेष्ठ समय माना गया है। इस दौरान भगवान की पूजा-आराधना, जप-तप, भजन-कीर्तन, सत्संग, कथा श्रवण, भागवत पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व बताया गया है।
राजा बलि की कथा से जुड़ा है चातुर्मास का महत्व
चातुर्मास में भगवान विष्णु के चार महीने की योग निद्रा के पीछे एक पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, राजा बलि बहुत ही पराक्रमी राजा थे और उनके बढ़ते प्रभाव से देवताओं को चिंता होने लगी, तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए और भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर उनसे तीन पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि महान दानी भी थे और बिना किसी संकोच के भगवान वामन की इच्छा स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान ने विराट रूप धारण किया। पहले पग में उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी और आकाश को नाप लिया, जबकि दूसरे पग में स्वर्ग लोक, तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा, तब राजा बलि ने विनम्रतापूर्वक अपना सिर भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया। राजा बलि की अद्भुत दानशीलता, भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बनने का वरदान दिया। तब राजा बलि ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे सदैव उनके साथ निवास करें। भक्त की इस भावना का सम्मान करते हुए भगवान ने यह वरदान दिया कि वे प्रत्येक वर्ष चार माह तक पाताल लोक में उनके साथ रहेंगे। इसी मान्यता के आधार पर देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक का समय भगवान विष्णु की योगनिद्रा का काल माना जाता है।

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