प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन का रूप देने में कृषि सखियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है- जिला पंचायत सीईओ कृषि सखी प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ


सीहोर, 16 दिसम्बर 2025  जिले में कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आर.ए.के. कृषि महाविद्यालय, सीहोर में कृषि सखी प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। पाँच दिवसीय यह प्रशिक्षण कार्यक्रम किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग एवं आर.ए.के. कृषि महाविद्यालय के संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है।

   प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती सर्जना यादव, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत, सीहोर द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने कृषि सखियों को संबोधित करते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती को जन-आंदोलन का रूप देने में कृषि सखियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कृषि सखियों से आह्वान किया कि वे ग्राम स्तर पर किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती के लाभों से अवगत कराएं तथा रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करें। साथ ही उन्होंने किसानों को अपने प्राकृतिक उत्पादों का स्थानीय बाजारों एवं जैविक हाटों के माध्यम से विपणन करने हेतु प्रेरित करने पर भी जोर दिया, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो सके।

  महाविद्यालय के डीन डॉ. एम. यासीन ने प्रशिक्षणार्थी कृषि सखियों को प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक पद्धतियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती भूमि की उर्वरता बनाए रखने के साथ-साथ जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन एवं मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी है। उन्होंने कृषि सखियों से प्रशिक्षण के दौरान सक्रिय सहभागिता एवं जिज्ञासाओं को खुलकर रखने का आग्रह किया। कार्यक्रम के दौरान श्री ए.के. उपाध्याय, उप संचालक कृषि, सीहोर ने जैविक खेती से होने वाले लाभों, जैविक प्रमाणीकरण की प्रक्रिया एवं इसके माध्यम से बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त करने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने रासायनिक उर्वरक यूरिया पर निर्भरता कम करने हेतु जैविक खादों एवं जैव उर्वरकों के उपयोग की जानकारी देते हुए राइजोबियम, एजोटोबैक्टर एवं पी.एस.बी. (फॉस्फेट सोल्यूबिलाइजिंग बैक्टीरिया) के महत्व को समझाया।

  कार्यक्रम में डॉ. जी.एस. गाठिये, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं विभाग प्रमुख, शस्य विज्ञान ने मृदा स्वास्थ्य के महत्व पर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ने से मृदा संरचना सुदृढ़ होती है, जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है तथा लाभदायक सूक्ष्म जीवों की सक्रियता बढ़ती है, जिससे सतत फसल उत्पादन संभव होता है। कार्यक्रम में डॉ. एस.पी. दत्ता, भूतपूर्व निदेशक, भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान द्वारा प्राकृतिक खेती की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती की अवधारणा पारंपरिक कृषि पद्धतियों से जुड़ी हुई है और वर्तमान समय में इन्हें पुनः अपनाने की नितांत आवश्यकता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिले की चयनित कृषि सखियाँ भाग ले रही हैं, जिन्हें प्रशिक्षण उपरांत ग्राम स्तर पर किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।

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