र्सचना का अधिकार पूर्व प्रधान मंत्री डॉ.मनमोहन की देन, जिसको वर्तमान सरकार कर रही है कमजोर-राजीव गुजराती


सीहोर। सीहोर जिला कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राजीव गुजराती ने बयान जारी कर बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और सोनिया गांधी के दूरदर्शी नेतृत्व में 12 अक्र्टबर 2005 को ऐतिहासिक सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम अस्तित्व में आया। यह र्यपीए सरकार के अधिकार-आधारित एजेंडा की पहली कड़ी थी, यह आरटीआई आधुनिक भारत के सबसे महत्वर्पर्ण लोकतांत्रिक सुधारों में से एक है। इसकी कमज़ोरी, लोकतंत्र की कमज़ोरी है। आरटीआई की 20वीं वर्षगांठ पर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस कार्नन की रक्षा और सशक्तिकरण के अपने संकल्प को दोहराती है, ताकि हर नागरिक निडर होकर सवाल र्पछ सके और समयबद्ध व प्रभावी उत्तर प्राप्त कर सके।

जिसमें मनरेगा (2005), वन अधिकार अधिनियम (2006), शिक्षा का अधिकार (2009), र्भमि अधिग्रहण में उचित मुआवज़ा का अधिकार अधिनियम (2013) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013) शामिल थे।

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास मौर्जद जानकारी तक पहुँच प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाना था, ताकि शासन व्यवस्था अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बन सके। ऑरटीआई समाज के सबसे हाशिए पर बसे लोगों के लिए जीवनरेखा साबित हुई है- इसने नागरिकों को उनके हक़ जैसे राशन, समय पर पेंशन, बकाया मजदूरी और छात्रवृत्तियाँ दिलाने में मदद की है। इसने सुनिश्चित किया कि सबसे गरीब व्यक्ति को जीवन की बुनियादी जरूरतों से वंचित न किया जाए।

आरटीआई कार्यकतार्ओं को कितने खतरों का सामना करना पड़ता है। अनेक कार्यकर्ता और नागरिक जो आरटीआई का उपयोग करते हैं, उन्हें उत्पीडऩ, धमकियों और हमलों का शिकार होना पड़ा है। इससे लोगों के भीतर भय का माहौल बना है और नागरिक आरटीआई का निर्भयता से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन अधिनियम, जिसे पारित किया जा चुका है, अब तक लार्ग नहीं हुआ है और इसके नियम अधिसूचित नहीं किए गए हैं। यह विधेयक यूपीए सरकार द्वारा पेश किया गया था और संसद के दोनों सदनों से पारित भी हुआ था, लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल (2014 के बाद) में न तो कार्नन लार्ग किया गया और न ही नियम बनाए गए। सुरक्षात्मक तंत्र के अभाव में प्रशासनिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले व्यक्ति धमकियों, उत्पीडऩ और हिंसक हमलों के प्रति असुरक्षित बने हुए हैं। इस अधिनियम का उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना था जो भ्रष्टाचार या गलत कार्यों का खुलासा करते हैं, लेकिन इसके लार्ग न होने से ये सभी सुरक्षा उपाय अर्थहीन हो गए हैं। अमेरिका या र्यरोपीय संघ जैसे लोकतंत्रों ने माना है कि भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा आवश्यक है, जबकि भारत एक ऐसा अपवाद है जहाँ कार्नन होते हुए भी सरकार ने इसे लागू करने से परहेज़ किया है।

आरटीआई अधिनियम की 20वीं वर्षगांठ पर हम दोहराते हैं कि सूचना का अधिकार केवल एक कार्नन नहीं, बल्कि भारत के नागरिकों के संवैधानिक और सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम है। आयोगों के लिए कार्य निष्पादन मानक तय किए जाएँ और निपटान दर की सार्वजनिक रिपोर्टिंग अनिवार्य की जाए। व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन अधिनियम को पूर्ण रूप से लार्ग कर आरटीआई उपयोगकतार्ओं और व्हिसलब्लोअर्स को सशक्त सुरक्षा प्रदान की जाए। आयोगों में विविधता सुनिश्चित की जाए- पत्रकारों, कार्यकतार्ओं, शिक्षाविदों और महिला प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।

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