सात दिवसीय भागवत कथा में उमड़ा आस्था का सैलाब, आज लगाया जाएगा छप्पन भोग भगवान कृष्ण ने पूतना का किया उद्धार-जगदगुरु पंडित अजय पुरोहित


सीहोर। भगवान कृष्ण को जान से मारने के तमाम प्रयास जब राजा कंस के निष्फल रहे तो उसने राक्षसी पूतना को भेजा। पूतना को यह अभिमान था कि वह जहरीला दूध पिलाकर भगवान को मौत की नींद सुला देगी। हालांकि इसके पीछे भी भगवान का ही वरदान रहा, जिसमें उन्होंने र्पतना को राक्षस योनि से मुक्ति दिलाने को कहा था। इस आशीर्वाद का ही असर रहा कि र्पतना वेश बदलकर भगवान श्रीकृष्ण को अपने स्तन से जहरीला दूध पिलाने का प्रयास करती है, लेकिन भगवान उसका वध कर उद्धार करते हैं। र्पतना वासना और माया का प्रतीक हैं। उक्त विचार ग्राम छतरपुर में जारी सात दिवसीय संगीतमय भागवत कथा के दौरान जगदगुरु पंडित अजय पुरोहित ने कहे। कथा के दौरान उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाललीलाओं के अलावा नंद उत्सव का वर्णन किया। भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला अत्यंत ही अनुकरणीय हैं। इनकी बाल लीला से हमें जीवन में आगे बढऩे की सीख मिलती हैं। द्वापर युग में राक्षसी एक पूतना थी, जिसनें दूध मुंहे बच्चे कृष्ण के साथ घात किया था, किंतु आज कलयुग में विभिन्न स्वरूपों में पूतना विद्यमान है। आज नारी गर्भावस्था शिशु को मार रही है। इसी मन की कुवृत्ति, स्वभाव का नाम पूतना है। मन में मलिनता आए, मन के बिगडऩे से संपूर्ण जीवन बिगड़ जाता है, यही र्पतना का रूप है। बालकों के साथ जो घात करे वही पूतना है। यमुना के पानी को कालिया नाग ने जहर से प्रर्दषित कर दिया था, जिसका मर्दन श्रीकृष्ण ने किया। द्वापर में भगवान कृष्ण ने जल संरक्षण एवं प्रर्दषण रहित करने का जो कार्य किया वह आज हमें भी वही कार्य अपनाना चाहिए और गंदगी डालकर नदियों को प्रर्दषित नहीं करना चाहिए। पंडित श्री पुरोहित ने कहा कि कंस ने नवजात शिशुओं का वध करने के लिए जिन असुरों को नियुक्त किया था उनमें र्पतना सबसे प्रधान थी। पूतना इच्छानुसार रूप बनाकर दिन-रात अबोध बच्चों का वध करती हुई र्घमा करती थी। श्रीकृष्ण की षष्ठी के दिन ही नंदबाबा के मथुरा चले जाने के बाद र्पतना ब्रज में पहुंची। उसने देखा कि बलवान गोप प्रत्येक द्वार पर पहरा दे रहे हैं अत: उसने अपने को सुन्दर स्त्री बना लिया। उसकी चोटियों में बेला-चमेली के फूल गुंथे थे। सुन्दर वस्त्र पहने थी। उसके कानों के कर्णर्फूल की चमक आभूषणों की झंकार करती, हाथ में एक कमल लेकर उसे नचाती हुई पूतना जब चली तो ऐसा प्रतीत हुआ कि साक्षात् लक्ष्मीजी अपने पति को देखने के लिए आई हों। पूतना का तन सुन्दर है पर मन मैला है। बाहर से प्रेम का आडम्बर है पर मन में बैर-भाव है। रूप तो उसने पत्नी व मां का धारण किया है पर मन में मारने की दुर्वृत्ति है। पूतना का सौंदर्य, श्रृंगार, बात करने का ढंग और उसकी शान-शौकत देखकर यशोदामाता ने सोचा कि यह कोई भले घर की स्त्री है इसलिए उन्होंने कोई विरोध नहीं किया और वह सीधे नंदभवन में चली गई। भगवान की ही लीलाशक्ति ने उसे अन्य किसी घर में जाने से रोककर नंदभवन में जाने की प्रेरणा दी। भगवान ने विष पिलाने आई पूतना का वध किया।

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